(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

05 उद्योगपर्व (196) Mahabarataham


॥ श्रीः ॥
5.80. अध्यायः 080
Mahabharata - Udyoga Parva - Chapter Topics
सहदेवेन श्रीकृष्णंप्रति कुरूणां शमाभिसन्धावपि युद्धपक्षस्यैव स्थापनकथनम् ॥ 1 ॥ सात्यकिना सहदेवपक्षानुमोदने योधानां सर्षात्सिंहनादः ॥ 2 ॥
Mahabharata - Udyoga Parva - Chapter Text

सहदेव उवाच। 5-80-0x(3631)(34618)
यदेतत्कथितं राज्ञा धर्म एष सनातनः।
यथा च युद्धमेव स्यात्तथा कार्यमरिन्दम ॥ 5-80-1(34619)
यदि प्रसममिच्छेयुः कुरवः पाण्डवैः सह।
तथापि युद्धं दाशार्ह योजयेथाः सहैव तैः ॥ 5-80-2(34620)
कथं नु दृष्ट्वा पाञ्चालीं तथा कृष्ण सभागताम्।
अवधेन प्रशाम्येत मम मन्युः सुयोधने ॥ 5-80-3(34621)
यदि भीमार्जुनौ कृष्ण धर्मराजश्च धार्मिकः ।
धर्ममुत्सृज्य तेनाहं योद्धुमिच्छामि संयुगे ॥ 5-80-4(34622)
ब्रूहि मद्वचनं कृष्ण सुयोधनमपण्डितम्।
कृच्छ्रे वने वा वस्तव्यं पुरे वा नागसाह्वये ॥ 5-80-5(34623)
सात्यकिरुवाच। 5-80-6x(3632)
सत्यमाह महाबाहो सहदेवो महामतिः।
दुर्योधनवधे शान्तिस्तस्य कोपस्य मे भवेत् ॥ 5-80-6(34624)
न जानासि यथा दृष्ट्वा चीराजिनधरान्वने।
तवापि मन्युरुद्धूतो दुःखितान्प्रेक्ष्य पाण्डवान् ॥ 5-80-7(34625)
तस्मान्माद्रीसुतः शूरो यदाह रणकर्कशः।
वचनं सर्वयोधानां तन्मतं पुरुषोत्तम ॥ 5-80-8(34626)
वैशम्पायन उवाच। 5-80-9x(3633)
एवं वदि वाक्यं तु युयुधाने महामतौ।
सुभीमः सिंहनादोऽभूद्योधानां तत्र सर्वशः ॥ 5-80-9(34627)
सर्वे हि सर्वशो वीरास्तद्वचः प्रत्यपूजयन्।
साधुसाध्विति शैनेयं हर्षयन्तो युयुत्सवः ॥ ॥ 5-80-10(34628)

इति श्रीमन्महाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि अशीतितमोऽध्यायः ॥

Mahabharata - Udyoga Parva - Chapter Footnotes
5-80-4 यदि यद्यपि भीमादयो धार्मिकाः स्युः तथापि अहं धर्ममुत्सृज्य तेन सह योद्धृमिच्छामि ॥


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